कौशल विकास मिशन में भुगतान संकट, प्रशिक्षण प्रदाता पलायन को मजबूर
नियमों को ताख पर रखकर अगस्त में हो पा रहा है टारगेट का आवंटन

सत्यवृत शुक्ल, लखनऊ।
उत्तर प्रदेश सरकार युवाओं को रोज़गार योग्य बनाने और उन्हें उद्योग की ज़रूरतों के मुताबिक़ कौशल उपलब्ध कराने के लिए कौशल विकास मिशन (UPSDM) चला रही है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि लंबे समय से प्रशिक्षण प्रदाताओं का भुगतान अटका हुआ है, जिससे मिशन पर सवाल उठने लगे हैं।
प्रशिक्षण प्रदाता परेशान, मिशन निदेशक से संवादहीनता
लगभग 1,500 प्रशिक्षण प्रदाता मिशन से जुड़े हुए हैं, लेकिन भुगतान न होने और प्रशासनिक उदासीनता के चलते अब सिर्फ 400–500 प्रदाता ही सक्रिय रूप से कार्य कर पा रहे हैं। मौजूदा मिशन निदेशक पुलकित खरे और एएमडी प्रिया सिंह पर आरोप है कि वे फाइलों पर अनावश्यक आपत्तियाँ लगाकर भुगतान रोकते हैं। इतना ही नहीं, प्रदाताओं का कहना है कि अधिकारियों द्वारा फोन तक नहीं उठाया जाता, जबकि मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं सभी अधिकारियों को जनता की समस्याएँ सुनने का निर्देश दे चुके हैं।


सीएम के मंच से तारीफ, जमीनी स्तर पर नाराज़गी
एक तरफ विश्व युवा कौशल दिवस जैसे आयोजनों में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ स्वयं विभाग की पीठ थपथपाते नज़र आते हैं, वहीं दूसरी ओर प्रशिक्षण प्रदाताओं का कहना है कि वे अब UPSDM से पलायन करने को मजबूर हैं।
विशेषज्ञ मानते हैं कि मिशन की विफलता के पीछे कई कारण
1. प्रशासनिक ढिलाई और नीतिगत असंगति – बार-बार योजना में बदलाव, अनुमोदन और लाइसेंसिंग में देरी।
2. गुणवत्ता की कमी – ट्रेनिंग सिर्फ़ “संख्या पूरी करने” तक सीमित, प्रशिक्षकों की क्षमता पर ध्यान नहीं।
3. उद्योग से जुड़ाव का अभाव – कोर्स स्थानीय उद्योगों की ज़रूरतों के अनुरूप नहीं।
4. रोज़गार में नाकामी – प्रशिक्षित युवाओं को नौकरी नहीं मिल पाई, कई जिलों में प्लेसमेंट दर 10–15% से भी कम।
5. भ्रष्टाचार और पारदर्शिता की कमी – फर्जी रजिस्ट्रेशन और “घोस्ट ट्रेनिंग” की शिकायतें।
6. इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी – ग्रामीण क्षेत्रों में लैब और उपकरण पुराने या न के बराबर।


कौशल विकास मिशन के आंकड़े और हकीकत
मार्च 2025 तक UPSDM ने लगभग 14.14 लाख युवाओं को प्रशिक्षण दिया। लक्ष्य हर साल 3 लाख युवाओं को प्रशिक्षित करने का था, लेकिन असंगठित प्लेसमेंट और रुकी हुई पेमेंट्स ने पूरी प्रणाली को कमजोर कर दिया। उत्तर प्रदेश कौशल विकास मिशन की मौजूदा स्थिति यह दिखाती है कि योजना और क्रियान्वयन में गहरी खाई है। गुणवत्ता और पारदर्शिता की जगह “कागज़ी उपलब्धियों” पर ज़ोर दिया गया और अब, लंबे समय से लंबित भुगतान के कारण प्रशिक्षण प्रदाता मिशन छोड़ने की कगार पर हैं।



